कमरा

दिनभर की घुटन के बाद
मेरा कमरा सांस ले रहा है
एक बड़ी सी खिड़की के
छोटे से हिस्से से
हल्की सी बारिश में
पानी के छीटें अंदर आ रही हैं
ठंडी हवा का साथ लेकर
और मेरे चेहरे पर जमी धूल
भीग कर गिर रही है ज़मीं पर
पर्दा लहरा रहा है
किसी महबूबा की दुपट्टे की तरह
इस अंधेरे कमरे में
रौशनी भी बादलों से आ रही है
और पीछा करती हुई
अपनी ही रफ़्तार से
आ रही है आवाज़
कमरे की और मेरी
खामोशी टूट रही है

ऐसा पहली बार नहीं हो रहा
लेकिन हर बार ऐसा लगता है
इन लम्हों की याददाश्त
कमज़ोर होती है शायद
इन लम्हों में ज़िन्दगी महसूस होती है
सांस लेना महज एक
प्रक्रिया का दोहराना नहीं लगता

मेरा कमरा भी ज़िन्दगी महसूस कर रहा है
और कमरे के साथ साथ मैं भी
दिनभर की तन्हाई के बाद
बारिश में भीगी शाम
किसी के साथ जैसा लगता है
साथ जो भरता है मुझमें साहस
कुछ और गम सहने की
कुछ और अकेले रहने की

फिर एक ऐसी शाम लौटती है
मेरी गर्म उदासी को ठंडा करने
मुझमें और मेरे कमरे में ज़िन्दगी भरने

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *